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विश्व पुस्तक मेले में हुआ मुकेश निर्विकार की कविता पुस्तक का लोकार्पण

नई दिल्ली : प्रगति मैदान, नई दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में मुकेश निर्विकार की कविता पुस्तक ‘प्रार्थनाएं कुछ इस तरह से करो’ का भव्य-लोकार्पण कार्यक्रम संपन्न हुआ।

प्रगति मैदान, हॉल न ०- 2, अन्तिका प्रकाशन के स्टॉल न0 28-29 पर आयोजित इस कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविद श्री प्रेमपाल शर्मा जी, प्रसिद्ध कथाकार-उपन्यासकार एवम ‘बया’ पत्रिका के संपादक श्री गौरीनाथ जी, प्रसिद्ध साहित्यकार एवं ‘समयांतर’ के संपादक श्री पंकज बिष्ट जी, प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री एस०आर ०हरनौट जी, प्रसिद्ध कवि श्री भूपेन्द्र बिष्ट जी, युवा लेखक श्री शचीन्द्र आर्य जी, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा से प्रोफेसर उमापति दीक्षित जी, प्रसिद्ध गीतकार-कवि डा ०सुभाष वशिष्ठ जी, साहित्यकार एवं शिक्षाविद डा ०डी ०एन ०शर्मा जी, ‘बुलंदप्रभा’ हिंदी त्रैमासिक पत्रिका के संपादक डॉ ० अनूप सिंह जी, इंद्रप्रस्थ साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष डा ०चंद्रमणि ब्रह्मदत्त जी, साहित्यकार श्री संजय पंकज जी, मीडिया जगत से ए0बी0पी0 न्यूज़ से श्री अभिषेक उपाध्याय जी, वर्धा से शोधार्थी श्री राजदीप राठौर, गाजीपुर से रंगकर्मी श्री रामजी सिंह यादव जी, यश पब्लिकेशन के हेड श्री शांतिस्वरूप शर्मा जी, कवयित्री श्रीमती कुंतेश दहलान जी, युवा चित्रकार श्री सुमित राजौरा जी, खुर्जा के कवि श्री प्रेम कुमार शर्मा जी ने इस कार्यक्रम में प्रतिभाग किया।

इस अवसर पर ‘बया’ सम्पादक श्री गौरीनाथ जी ने कहा कि इस संग्रह में बडी अलग ढंग की कविताएॅं हैं, यानि अर्थतंत्र किस तरह से पूरे लोकतंत्र, जनतंत्र और मानवीय व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है, इस पर मुकेश निर्विकार ने बडी बारीकी से, बहुत गंभीरता और तन्मयता से काम किया है। यह अपनी तरह का एक विशिष्ट कविता संग्रह है।

प्रसिद्ध शिक्षाविद् श्री प्रेमपाल शर्मा ने कहा कि संग्रह में बिल्कुल एक आधुनिक चेतना के साथ, जो मुद्रा का खेल है, बाजार की भूमिका है, इन सबका बडा प्रभावपूर्ण वर्णन है। इस अवसर पर उन्होंने संग्रह से कविताओं का वाचन भी किया।

डॉ0 डी0एन0शर्मा ने कहा की मुकेश निर्विकार की कविताओं में बहुत बड़ा वैशिष्ट्य है, वर्तमान समकालीन मूल्यों में मुद्रा का मूल्य और जो उससे जुडे हुए सरोकार हैं, वह बहुत शिद्दत से मुकेश निर्विकार ने व्यक्त किये हैं। इस संग्रह को यकीनन पाठकों से व्यापक सम्मान मिलेगा।

बुलन्दप्रभा के सम्पादक डॉ0 अनूप सिंह ने इस संग्रह की कविताओं को ‘व्यक्त व अव्यक्त के बीच लडती कविताएॅ बतलाया है। उन्होने कहा कि मुद्रा आज वैश्विक सिरदर्द बनती जा रही है, इसी भयावह स्थिति को दर्शाती हैं, इस संग्रह की कविताएं। ऐसे सारगर्भित विषयबद्ध विशिष्ट कविता-संग्रह के लिए उन्होंने मुकेश निर्विकार को बधाई दी।

ज्ञातव्य है कि सुप्रसिद्ध समालोचक डॉ0 ओम निश्चल जी ने इस संग्रह की प्रतिक्रिया में कहा है कि इस संग्रह की कविताओं में वाकई नएपन की खुशबू है। समाज की विडम्बना पर हल्की चोटें करते हुए जो कविताएं कवि ने लिखी हैं, वे छूती हैं, सवाल उठाती हैं। निर्विकार ने इस संग्रह में किसी सर्वहारा की बात नहीं की है, बल्कि पग-पग पर अर्थ हारे व्यक्ति की बात की है। मुद्राहीनता और अर्थहारे हुए लोगों की कैसी विवश मुद्राएं होती हैं, उसे भांति-भांति से दर्ज करने मेें मुकेश निर्विकर कामयाब रहे हैं।

सुप्रसिद्ध आलोचक श्री राजीव सक्सैना के अनुसार यह एक अद्भूत अनूठा कविता संकलन है, जो भविष्य में एक बेहद चर्चित काव्य संकलन सिद्ध होने वाला है। इसमें मुकेश निर्विकार ने पाठकों को कविता के एक नए यथार्थरूप यानी ‘मौद्रिक यथार्थ’ या ‘मॉनेटरी रियलिज्म’ से परिचय कराया है। संग्रह की प्रत्येक कविता अपने रचाव में नया फार्मेट अथवा नया रूपाकार ग्रहण करती दिखाई पडती है। संकलन में ‘मौद्रिक यथार्थ’ के इतने संस्तरण दिखाई पड़ते हैं कि समूचा संकलन ही एक भव्य काव्य वितान तले यथार्थ का एक सम्मोहक ‘माया दर्पण’ जान पडता है।

वयोवृद्ध साहित्यकार एवं आलोचक डॉ0 कमल किशोर गोयनका जी का मानना है कि मुकेश निर्विकार इस कविता संग्रह में अपनी सदी के मुद्रामुखी तथा मुद्रागृह मंे बन्दी रूप को गहराई से अंकित करते हैं और मनुष्य की भावनात्मक उदात्ताओं को भी जीवन्त रूप देते हैं। मैं इस कारण मुकेश निर्विकार को इस दशक का एक प्रतिनिधि कवि मानता हूॅं। यह संग्रह इस वर्ष का ही नहीं, आने वाले वर्षों में भी अपनी गहन अनुभूतियों तथा संवेदनाओं के साथ मानव नियति के प्रति चिंतनशील कवि के रूप पठनीय तथा स्मरणीय बना रहेगा।

अंत में मुकेश निर्विकार ने सभी का आभार व्यक्त किया तथा कहा कि संग्रह की कविताएं विषयबद्ध कविताएं हैं, मुद्रा इसकी मुख्य थीम है। मौद्रिक वर्चस्व के इस दौर में हम जो संत्रास की ज़िन्दगी जी रहे हैं, इसी को बौद्धिक और भावनात्मक रूप से इसे काव्यात्मक रूप में अभिव्यक्ति प्रदान की गयी है।

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